Friday, October 29, 2010

एक धुंधली सी परछाई

मेरे ज़हन में आई..
एक धुंधली सी परछाई
क्या ये रिश्ता था
कौन सा नाता था
मन ना समझ पाता था
लेकिन कही कुछ था
कभी कुछ हुआ था
नादान मन ने फिर से इक आस लगाई
कि नज़र आए फिर से वो धुंधली सी परछाई

एक और कोशिश की मन ने
पढ़ने की उस चेहरे को
कुछ साफ हुआ था
कुछ समझ आ रहा था
बीते समय का सागर...
मेरी सोच से टकरा रहा था
देख कर उस मर्मस्पर्शी चेहरे की झलक
शिथिल मन ने ली अंगड़ाई
एक धुंधली सी परछाई

सोचा चलु एक कदम
बस एक और कदम
थाम लू जा के हाथ
पूरे अधिकार के साथ
लेकिन ना तो दूरी..
ना उस चेहरे का रोष कम हुआ
मन ने ज़ोर से इक आह लगाई
एक धुंधली सी परछाई

बोल क्या करू मैं आज
कैसे बदलू जो बीत चुका
वापस पाना चाहता हूँ वो पल
समझ गया हूँ तेरी अहमियत
बस एक मौका दे
सिर्फ़ एक मौका दे
लेकिन वो हामी ना भर पाई
वो धुंधली सी परछाई

कैसे दे दूं तुझको मौका
कैसे भर दूं हामी
आज मेरे बंधन अलग है
आज मेरे रिश्ते नये है
कल तक जो तेरा था
सिमट गयी है परछाई में
दुनिया से मैं डरती हूँ
ऐसे ही मिलेंगें तनहाई में


बस इतना कह कर चली गयी
फिर मिलेंगें भी ना बोल सका
धूंधलापन और बढ़ा..
और भी बढ़ता रहा

हाँ तुझ पर तो बंधन है
नये बने कुछ रिश्ते है
तेरी भी मजबूरी है
पर आज़ाद कर उस परछाई को
वो आज भी मेरी है!!

फिर मैं खड़ा रहा
देखता रहा..
सोचता रहा..
लेकिन कोई आवाज़ ना आई
चली गयी वो परछाई
एक धुंधली सी परछाई

"मैं"